कुछ भी नहीं

बरसता है पानी पर ठहरता कुछ भी नहींअम्बर का धरती से अब वास्ता कुछ भी नहींज़िंदगी भर यही समझा कि बहुत कुछ हूँ मैंख़ाक ने छू के कहा कि रहता कुछ भी नहींअपने होने की गवाही भी कहाँ तक दूँ मैंआईना देख लिया उसमें दिखा कुछ भी नहींएक मिट्टी का सफ़र है एक मिट्टी की... Continue Reading →

द्वन्द

अच्छा है! अच्छा है कि किताबें नहीं भाती तुम्हें कोई और होगा तुम्हारे जीवन में जिसको तुम, पढ़ना चाहते होगे तसल्ली से । पुरानी किताबों के जर्जर ज़िल्द-सी उनकी त्वचा, जिनपर कठोरता से उँगलियाँ भी नहीं फेरी जा सकती, पीले पड़े पन्नों जैसे उनके जज़्बात तुम अपने, खीसे में रख संभालना चाहती होगी अच्छा है!... Continue Reading →

Dan Brown के लिए एक प्रेम पत्र

जीवन के तमाम उतार चढ़ावों के मध्य एक अच्छी किताब आपकी सबसे अच्छी साथी साबित हो सकती है । खासकर कि ऐसी किताबें जो कुछ समय के लिए ही सही लेकिन आपको ऐसे स्थान पर पहुँचाने में समर्थ हो जहाँ से जीवन के कल्प नगण्य प्रतीत होने लगें। Dan Brown एक ब्रिटिश लेखक हैं जिनकी... Continue Reading →

Perfect Days / Komorebi

'Komorebi' - एक जापानी शब्द है जिसका अर्थ है - 'पत्तियों के बीच से झाँकती हुई सूर्य-किरणें' किन्तु यह शब्द बस इतने पर ही न सिमटकर एक व्यापक अर्थ का द्योतक है। जैसे पत्तियों के बीच से झाँकती वह एक किरण अपने आप में कितनी छोटी और मामूली-सी लगने वाली वस्तु है किन्तु फुर्सत से... Continue Reading →

कोडईकनाल यात्रा

"हिल-स्टेशन अकेला कौन जाता है यार?" "अकेले क्या मज़ा आएगा?" "तुम्हारी तस्वीर कौन लेगा वहाँ?" ऐसे और भी प्रश्न हैं जो अन्य लोगों से ज़्यादा मैंने ही स्वयं से अधिक बार पूछे । घर से निकलने से लेकर बस में बैठने तक आपा-धापी में इस बात का एहसास नहीं हुआ । इस बात का एहसास... Continue Reading →

Check Mate!

हम दोनों को ही पहेलियाँ बहुत पसंद थी । सुडोकु, क्रॉसवर्ड, शतरंज...इन जैसे खेलों में हम दिन-भर अपना दिमाग लगा सकते थे । ऐसा भी कह सकते हैं कि हमें वो चीज़ें पसंद थी जिनमें हमारा दिमाग इस्तेमाल होता है और दिल नहीं । दिल लगाना हमने नहीं सीखा और किसी ने सिखाया भी नहीं... Continue Reading →

Train of Thoughts – 3

जनरल डब्बे में सफर करने का सौभाग्य आज बहुत दिन बाद मिला। इस सुअवसर पर जो भी दिखा और मन में आया वो लिख लिया ― 1. एक युवक साइड खिड़की वाली सीट पर बैठा हुआ है। उसने दायीं आँख के पास "माँ" नाम का टैटू गुदवा रखा है। सीट क्लियर न होने पर उसे... Continue Reading →

क्या फ़र्क़ पड़ता है?

मैं क़रीब एक घंटे से इटारसी स्टेशन पर उसका इंतज़ार कर रहा था। उसने कहा था कि वो पहुँच जाएगी, मैं चिंता न करूँ। मैं चिंता कर रहा था। उसका फोन बंद बता रहा था। 15 मिनट बाद ट्रेन आने वाली थी जो हमें बनारस लेकर जाएगी। मैं मेनगेट पर खड़ा होकर उसका इंतज़ार कर... Continue Reading →

छोटी-छोटी बड़ी कहानियाँ – 2

बौआ कक्का कुण्डलपुर, बिहार का एक प्रमुख जैन-तीर्थ है क्योंकि वहाँ भगवान महावीर का जन्म हुआ था । हम दो दिनों के लिए कुण्डलपुर में रुकने वाले थे इसलिए गैस और स्टोव की आवश्यकता थी । मैनेजर से बोलने पर उन्होंने किसी बौआ कक्का को आवाज़ दी । तुरंत ही पास वाले बगीचे से एक... Continue Reading →

मैं

आईने में हर रोज़ मैं उसे देखता हूँ जिसे मैं सबको दिखाना चाहता हूँ। मुझे कभी वो दिखता ही नहीं, जिसे मैंने आजतक ख़ुद से छुपा कर रखा। जो कभी आईने की गहराइयों में छुप जाता है, तो कभी देह की चमड़ी की सकरी परतों में। जिसे मैं सबको दिखा देता हूँ, उसपर मुझे बेहद... Continue Reading →

Train of Thoughts – 2

यह असलियत से भागने की एक और रिरियाती नाकाम कोशिश है। अभी तक मैं कुछ ज़्यादा सोचने के मूड में आया नहीं हूँ लेकिन मुझे उम्मीद है कि दिन के अंत तक कुछ अच्छा निकल कर आ जायेगा। ट्रेन के सफ़र अब भी बिल्कुल ट्रैन के सफ़र की तरह ही हैं। वही थके और बुझे... Continue Reading →

नाम, इज़्ज़त और भ्रम

...तो ये सारा झंझट चालू हुआ जून की उस रात को जिस दिन उसका जन्म हुआ और उसको एक नाम दे दिया गया। 50-60 वर्ष के उस छोटे से जीवन में वो जिस नाम से जानी जाएगी वो उसको किसी और ने दे दिया। अरे! कम से कम एक बार डिसकस तो करना चाहिए यार!... Continue Reading →

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